गीता आरती | श्रीमती विजया गोडबोले जी
श्रीमद्भगवद्गीता आरती
जय भगवद्गीते, जय भगवद्गीते।
हरि-हिय-कमल-विहारिणि , सुन्दर सुपुनीते॥ जय.॥
कर्म-सुमर्म-प्रकाशिनि, कामासक्तिहरा।
तत्त्वज्ञान-विकाशिनि, विद्या ब्रह्म परा॥ जय.॥
निश्चल-भक्ति-विधायिनि, निर्मल, मलहारी।
शरण-रहस्य-प्रदायिनि, सब विधि सुखकारी॥ जय.॥
राग-द्वेष-विदारिणि, कारिणि मोद सदा।
भव-भय-हारिणि, तारिणि, परमानन्दप्रदा॥ जय.॥
आसुर-भाव-विनाशिनि, नाशिनि तम-रजनी।
दैवी सद्गुणदायिनि, हरि-रसिका सजनी॥ जय.॥
समता, त्याग सिखावनि, हरि-मुख की बानी।
सकल शास्त्र की स्वामिनि, श्रुतियों की रानी॥ जय.॥
दया-सुधा बरसावनि मातु! कृपा कीजै।
हरि-पद-प्रेम दान कर, अपनो कर लीजै॥ जय.॥