पद्मिनी एकादशी

पद्मिनी एकादशी व्रत कथा एवं पूजन विधि

(श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि)

पद्मिनी एकादशी भगवान को अतिप्रिय है। इस व्रत का विधि पूर्वक पालन करने वाला विष्णु लोक को जाता है। इस व्रत के पालन से व्यक्ति सभी प्रकार के यज्ञों, व्रतों एवं तपस्या का फल प्राप्त कर लेता है। 

भगवान श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से बोले, त्रेता युग में एक परम पराक्रमी राजा कृतवीर्य था। इस राजा की कई रानियां थी परंतु किसी भी रानी से राजा को पुत्र की प्राप्ति नहीं हुई। संतानहीन होने के कारण राजा और उनकी रानियां तमाम सुख सुविधाओं के बावजूद दु:खी रहते थे। संतान प्राप्ति की कामना से तब राजा अपनी रानियों के साथ तपस्या करने चल पड़े। हजारों वर्ष तक तपस्या करते हुए राजा की सिर्फ हड्डियां ही शेष रह गयी परंतु उनकी तपस्या सफल न रही। रानी ने तब देवी अनुसूया से उपाय पूछा। देवी ने उन्हें मल मास में शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने के लिए कहा।

अनुसूया ने रानी को व्रत का विधान भी बताया। रानी ने तब देवी अनुसूया के बताये विधान के अनुसार पद्मिनी एकादशी का व्रत रखा। व्रत की समाप्ति पर भगवान प्रकट हुए और वरदान मांगने के लिए कहा। रानी ने भगवान से कहा प्रभु आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मेरे बदले मेरे पति को वरदान दीजिए। भगवान ने तब राजा से वरदान मांगने के लिए कहा। राजा ने भगवान से प्रार्थना की कि आप मुझे ऐसा पुत्र प्रदान करें जो सर्वगुण सम्पन्न हो जो तीनों लोकों में आदरणीय हो और आपके अतिरिक्त किसी से पराजित न हो। भगवान तथास्तु कह कर विदा हो गये। कुछ समय पश्चात रानी ने एक पुत्र को जन्म दिया जो कार्तवीर्य अर्जुन के नाम से जाना गया। कालान्तर में यह बालक अत्यंत पराक्रमी राजा हुआ जिसने रावण को भी बंदी बना लिया था।

इस प्रकार इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य जीवन सफल होता है, व्यक्ति जीवन का सुख भोगकर श्रीहरि के लोक में स्थान प्राप्त करता है।

चिन्तनिका विभाग
लर्नगीता, गीता परिवार?

साहित्य प्रकाशन

गीता परिवार के विचारों के प्रचार और कार्य के विस्तार में संस्था द्वारा प्रकाशित साहित्य का बड़ा योगदान है | कहते हैं कि “जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि’. गीता परिवार के कार्यकर्ता अपने क्षेत्रों में, आसपास के गाँवों में प्रत्यक्ष कार्य करते हैं किन्तु इतने बड़े देश में जहाँ कार्यकर्ता प्रत्यक्ष नहीं पहुँच पाते वहाँ भी संस्कारों की धारा को पहुँचाने का कार्य सम्भव हुआ गीता परिवार द्वारा प्रकाशित साहित्य के माध्यम से. प्रारंभ में संस्कार शिविरों के लिए गीत, संस्कृत श्लोक इत्यादि के संकलन वाली एक पाठमाला का प्रकाशन सबसे पहले हुआ था | संस्कार शिविरों के सञ्चालन में ये पाठमाला अत्यंत सहायक हुआ करती थी | कार्य के विस्तार के साथ नए-नए प्रयोग भी होने लगे | हर एक संस्कार शिविर अनेक नए अनुभव लेकर आता था और हर एक प्रयोग भविष्य के लिए नयी राह तैयार करता था | दूसरी ओर स्थान-स्थान पर नए कार्यकर्ता नए संस्कार केंद्र भी खोल रहे थे | कार्य प्रभावी और सरल हो इसके लिए एक अभ्यासक्रम के निर्माण की आवश्यकता भी प्रतीत होने लगी | प्रयोगों और अनुभवों के आधार पर ही बाल संस्कार कार्य के लिए पाठक्रम तैयार हुआ |

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विविध प्रशिक्षण वर्ग

हर एक बच्चे मे कोई न कोई हुनर छिपा होता है. विद्यालय के अवकाश के समय गीता परिवार विविध छंद वर्गो का आयोजन करता है. इन वर्गो मे बच्चे अपनी-अपनी रुचि के अनुसार अनेक विषयो का प्रशिक्षण एवं अनुभव प्राप्त करते है. आर्ट-क्राफ्ट, शतरंज, टेबल टेनिस, सुलेखन, मेहंदी, रंगोली, स्केटिंग, क्रिकेट, नृत्य, सुगम संगीत आदि अनेक विषयो का प्रशिक्षण प्रतिवर्ष दिया जाता है. इन वर्गो मे प्राप्त अनुभव से प्रेरित होकर अनेक बच्चो को अपने भीतर छिपी प्रतिभा की अनुभूति होती है और वे आगे जाकर इन विषयो का विधिवत प्रशिक्षण प्राप्त करते है.

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स्वामी विवेकानंद सम्मान

राष्ट्र के नव-निर्माण, पुनरुत्थान और विकास का कार्य किसी एक संस्था या किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं है | अनेकानेक संस्थाएँ इस दिशा में कार्य कर रहीं हैं | “इदं न मम, इदं राष्ट्राय स्वाहा’ कहते हुए अनगिनत महानुभावों ने, विभूतियों ने अपना जीवन राष्ट्र-सेवा के यज्ञ में समिधा के समान समर्पित किया दिया है |
जिस प्रकार हिमगिरि अपने आपको धीरे – धीरे गलाकर लोक-कल्याण के लिए जल-प्रवाह का निर्माण करते रहता है, वैसे ही यश, कीर्ति, प्रतिष्ठा की चाह किये बिना ये विभूतियाँ मौन रूप से अपनी साधना करते रहती हैं | हमारा भी कर्तव्य बनता है कि हम ऐसे निःस्वार्थी महानुभावों के प्रति कृतज्ञ रहें, उनके त्याग-तपस्या का स्मरण रखें | कृतज्ञता की अभिव्यक्ति के इसी भाव के साथ गीता परिवार द्वारा ऐसे महानुभावों को “स्वामी विवेकानंद सम्मान’ अर्पित किया जाता है| स्वामी विवेकानंद को गीता परिवार ने एक तत्व के रूप में स्वीकार किया है | भगवद्भक्ति, भगवद्गीता, भारत माता और विज्ञान-दृष्टि इन सभी तत्वों का समन्वय जिनमे हैं वो हैं – स्वामी विवेकानंद | राष्ट्र निर्माण में उल्लेखनीय योगदान देनेवाले सेवाव्रती के पूजन से सभी को प्रेरणा मिलती है।

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संस्कार वाटिका

गीता परिवार के कार्य की शुरुआत संस्कार शिविरों की संकल्पना से हुई किंतु कार्य का विस्तार अनिवासी संस्कार वर्गो के साथ हुआ जिसे हम ‘संस्कार वाटिका’ कहते हैं. ग्रीष्मकालीन, शीतकालीन अथवा दिवाली की छुट्टीयो मे देश के अनेक शहरो तथा दूर-दूर के गांवो मे १० से १५ दिनो के अनिवासी संस्कार वाटिका का आयोजन किया जाता है. इन वर्गो मे बच्चे प्रतिदिन ३ घंटे के लिये आते हैं. संस्कार वाटिका मे संस्कृत पाठांतर. प्रात्यक्षिक प्रबोधन, आर्ट-क्राफ्ट, खेल-कूद, कथाकथन आदि उपक्रम लिये जाते हैं. संस्कार वाटिका के लिये गीता परिवार ने पाठ्यक्रम की ७ पुस्तको का निर्माण एवं प्रकाशन किया है. हजारो कार्यकर्ता इन वर्गो का संचालन करते हैं.

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